अहमदाबाद | 14 जून 2025 —
हर विमान उड़ान से पहले न सिर्फ आसमान छूने की तैयारी करता है, बल्कि उसमें बैठे हर यात्री की उम्मीदें, सपने और किसी का इंतज़ार भी उड़ान भरता है। लेकिन जब वही विमान ज़मीन से टकरा जाए, तो सिर्फ एक हादसा नहीं होता — वो कई कहानियों का अधूरा पड़ जाना होता है।
अहमदाबाद में हुए इस ताज़ा प्लेन क्रैश की खबर ने देश को झकझोर कर रख दिया। अधिकतर मीडिया चैनल हेडलाइन चला रहे हैं – “तकनीकी खराबी?”, “पायलट की गलती?”, “डीजीसीए की जांच शुरू”। लेकिन इस खबर की तह में जो इंसानी पहलू है, वो कहीं खो गया है।
एक अधूरी विदाई
इस विमान में बैठी 68 वर्षीय उषा देवी, अपने बेटे से आखिरी बार मिलने मुंबई जा रही थीं। बेटे ने टिकट भेजते हुए कहा था — “माँ, इस बार तुम्हें खुद खाना बनाकर खिलाऊंगा।” लेकिन वो खाना अब सिर्फ उषा देवी की अधूरी स्मृतियों में रहेगा।
पायलट नहीं, पिता था वो
कैप्टन राकेश मेहता, जो विमान उड़ा रहे थे — उनके दो छोटे बच्चे रोज़ रात को वीडियो कॉल पर पूछते थे, “पापा कब आएंगे?” इस बार जवाब देने वाला कोई नहीं बचा। मीडिया उन्हें सिर्फ "पायलट" कह रही है, लेकिन उनके लिए वो एक पिता, पति और दोस्त भी थे — जिसकी कमी कोई तकनीकी रिपोर्ट पूरी नहीं कर सकती।
मलबे में बिखरे सपने
हादसे के बाद घटनास्थल पर एक डायरी मिली। उसमें एक युवती ने लिखा था —
“ये मेरी पहली फ्लाइट है, बहुत डर लग रहा है लेकिन पापा ने कहा था, 'बेटी उड़ो, अब तुझे कोई रोक नहीं सकता'।”
वो बेटी उड़ तो गई, लेकिन ज़िंदगी से नहीं, इस दुनिया से।
वो सवाल जो अब भी अनुत्तरित हैं
क्या हमारी विमानन सुरक्षा प्रणाली वाकई उतनी मजबूत है, जितना दावा किया जाता है?
क्या प्लेन में तकनीकी खराबी की शिकायतें पहले से मौजूद थीं?
क्या इस हादसे को टाला जा सकता था?
इन सवालों का जवाब शायद रिपोर्टें दे दें, लेकिन जिन परिवारों ने अपने अपने लोगों को खोया, उनके लिए अब कोई उत्तर मायने नहीं रखता।
आख़िरी बात
ये कोई आम हादसा नहीं था। ये उस देश में हुआ जहाँ उड़ान को आज़ादी का प्रतीक माना जाता है। और जब उड़ान ही छिन जाए, तो सिर्फ मलबा नहीं गिरता — एक देश की आत्मा पर खरोंच पड़ती है।

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