नमस्कार, जय भीम दोस्तों! आज बात करेंगे ग्वालियर हाई कोर्ट में हाल ही में हुए विवाद के बारे में।
ग्वालियर हाई कोर्ट के कुछ मनुवादी वकीलों ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा लगाने का विरोध किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि "हम यहाँ बाबासाहेब की मूर्ति नहीं लगने देंगे।"
यह वही देश है जहाँ सर्वोच्च न्यायालय के Chief Justice of India बनने पर सबसे पहले न्याय के प्रतीक डॉ. अंबेडकर को नमन किया जाता है।
विरोध इतना बढ़ा कि अब कुछ लोग बाबासाहेब को संविधान निर्माता मानने से भी इनकार कर रहे हैं। वे अब अंबेडकर जी के ऐतिहासिक योगदान को नकारने की कोशिश कर रहे हैं।
कथन यह सामने आया है कि
"अंबेडकर कभी संविधान निर्माता नहीं थे। कृपया उन्हें ऐसा न कहें। मैं वचन देता हूँ कि भविष्य में उन्हें संविधान निर्माता नहीं कहेंगे।"
यह बात तब कही जा रही है जब हमें मालूम है कि डॉक्टर अंबेडकर के पास 32 डिग्रियाँ थीं और वे 9 भाषाओं के ज्ञाता थे। फिर भी, आज कुछ लोग उनके संविधान निर्माता होने पर सवाल उठा रहे हैं।
अब सवाल यह उठा रहा है कि
डॉक्टर अंबेडकर को संविधान निर्माता क्यों माना जाता है?"
जब संविधान सभा बनी, तो सभी सदस्यों के मन में एक ही प्रश्न था—"ऐसा कौन है जो पूरे देश के लिए संविधान का मसौदा बना सकता है?"
सबकी नज़र एक ही नाम पर गई— डॉक्टर भीमराव अंबेडकर। क्योंकि भारत जैसे विविध धर्म, भाषाएँ और जातियों वाले देश में ऐसा कोई और नहीं था जो संविधान को समेट सके।
विरोध करने वालों को अंबेडकर के संविधान लिखने से समस्या नहीं है, बल्कि इस बात से है कि एक दलित व्यक्ति इस ऐतिहासिक भूमिका में था।
कुछ लोग कहते हैं कि बाबासाहेब को सिर्फ आरक्षण की व्यवस्था का श्रेय जाता है और उनका योगदान केवल एससी/एसटी के लिए था।
वे कहते हैं कि संविधान के निर्माता बी. एन. राव थे, और अंबेडकर केवल कानूनी सलाहकार थे।
लेकिन इतिहास गवाह है—संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ही थे। प्रारूप समिति में सात सदस्य थे, पर अधिकांश सदस्य व्यस्त थे या अनुपस्थित। परिणामस्वरूप, मसौदा तैयार करने की पूरी जिम्मेदारी अंबेडकर जी पर आ गई।
टी. टी. कृष्णमाचारी ने भी संसद में कहा था:
"वैसे तो प्रारूप समिति में सात सदस्य थे, पर काम सिर्फ एक आदमी ने किया— डॉक्टर अंबेडकर ने।"
विदेशों में बाबासाहेब की मूर्तियाँ लगाई जाती हैं, उनका सम्मान किया जाता है। लेकिन भारत में, जहाँ उन्होंने जन्म लिया, वहाँ उनका अपमान किया जाता है—यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
क्या यह जातिवाद नहीं है?
मनुवादी सोच वाले लोग इस देश के लिए खतरनाक हैं।
मेरा आग्रह है कि ऐसे लोगों का विरोध होना चाहिए। अगर ये लोग वकील के पद पर बने रहे, तो न्याय एकतरफा होगा।
मैं आप सबसे निवेदन करता हूँ कि इस सोच के खिलाफ आवाज़ उठाएं और कमेंट क
रके अपनी राय दें।
धन्यवाद। जय भीम!
